Monday, March 15, 2010

फिर से ढूढ़ता हूँ , ओ अतुल्य गर्व , जो जा छुपा है इस पावन भूगर्भ में, शायद वक़्त की तलाश में विश्राम कर रहा होगा...... उन सदियों की परम्पराए पुनः उजागर करनी है, जिन्हें भूल रहा है माँ भारती का सपूत...... फिर से विश्व में स्थापना करनी है उस पावन धर्म की जो सनातन है कल्याद्कारी है , नित्य हैं नूतन है..... फिर से विश्व को दिखाना है उन वेदों का ज्ञान जिनके पन्ने पलटना भूल गया है माटी का लाल॥... फिर से फैलाना है इस पवित्र गीता ज्ञान को इस अंधकार में जहा कभी मनुष्यों का मंदिर था...... कुछ और नहीं बस मनुष्य को फिर से मनुष्य, और विश्व को फिर से विश्व बनाना है, जहा लोग लड़ते न हो जंगल में पशुओ कीं तरह....... इन्ही संकल्पों के साथ नूतन वर्ष की शुरुआत करे.........................